मकर संक्रांति:समय की संक्रांति और राष्ट्रीय चेतना-डॉ. अरुण कुमार द्विवेदी

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मकर संक्रांति भारतीय सभ्यता की उस निरंतर परंपरा का प्रतीक है, जिसमें समय को केवल मापा नहीं गया, बल्कि समझा और जिया गया है।

जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है, तब यह घटना केवल खगोल विज्ञान की नहीं रहती, बल्कि समाज के लिए दिशा-बोध का संदेश बन जाती है।

भारतीय चिंतन में सूर्य केवल प्रकाश का स्रोत नहीं, बल्कि चेतना, अनुशासन और जीवन-लय का प्रतीक है।

ऋग्वेद में सूर्य को जगत की गति का आधार बताया गया है—

“उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।”
(ऋग्वेद, मंडल 1, सूक्त 115, मंत्र 1)

अर्थात सूर्य समस्त संसार को जाग्रत करने वाला देव है, जिसकी किरणें जीवन को गति देती हैं। यही भाव मकर संक्रांति के मूल में निहित है।यह संयोग महत्वपूर्ण है कि मकर संक्रांति अन्य अधिकांश पर्वों की तरह चंद्र गणना पर आधारित न होकर सूर्य की गति से जुड़ी है। यह तथ्य स्वयं भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिक और स्थायित्वपूर्ण दृष्टि को दर्शाता है। सूर्य का उत्तरायण होना यह संकेत देता है कि प्रकृति का चक्र अब उर्ध्वगामी ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। भारतीय दर्शन में इसे केवल मौसमी परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन में सकारात्मक प्रवाह का समय माना गया है।

आज के राष्ट्रीय संदर्भ में मकर संक्रांति का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। भारत एक ओर आर्थिक विस्तार, तकनीकी प्रगति और वैश्विक प्रभाव की दिशा में आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक असमानता, मानसिक तनाव और मूल्यगत असंतुलन जैसी चुनौतियाँ भी सामने हैं। ऐसे समय में यह पर्व हमें यह सोचने का अवसर देता है कि विकास की गति के साथ उसकी दिशा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। क्या हमारी प्रगति केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित है, या वह मानवीय संवेदना और सामाजिक संतुलन को भी साथ लेकर चल रही है   ?

भारतीय परंपरा में मकर संक्रांति से जुड़ी स्नान और दान की परिकल्पना को अक्सर केवल धार्मिक कर्मकांड के रूप में देखा जाता है, जबकि इनका आशय गहरा सामाजिक और नैतिक है। स्नान आत्मशुद्धि का प्रतीक है—अपने भीतर जमी जड़ता और नकारात्मकता को छोड़ने का संकल्प। दान सामाजिक उत्तरदायित्व का व्यावहारिक रूप है। तैत्तिरीय उपनिषद में स्पष्ट कहा गया है—

“अन्नं न निन्द्यात्। अन्नं बहु कुर्वीत।”
(तैत्तिरीय उपनिषद, भृगुवल्ली, 3.7)

अर्थात अन्न का अपमान न करो और अन्न की समृद्धि सभी के लिए सुनिश्चित करो। यह विचार आज के सामाजिक और आर्थिक विमर्श में भी उतना ही प्रासंगिक है।मकर संक्रांति भारतीय कृषि संस्कृति से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई है। यह पर्व अन्नदाता, धरती और सूर्य के परस्पर संबंध को रेखांकित करता है। आज जब कृषि संकट, जलवायु परिवर्तन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, तब यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि स्मरण है कि राष्ट्र की स्थिरता और समृद्धि की जड़ें खेतों में हैं। भारतीय लोक परंपराओं में—चाहे वह उत्तर भारत की खिचड़ी हो, पश्चिम भारत का तिल-गुड़ या दक्षिण भारत का पोंगल—भाव एक ही है: कृतज्ञता और साझेदारी।

युवाओं के संदर्भ में मकर संक्रांति का संदेश विशेष महत्व रखता है। यह पर्व सिखाता है कि जीवन में परिवर्तन आकस्मिक नहीं होता, बल्कि अनुशासन और निरंतर कर्म से आता है। भगवद्गीता में उत्तरायण और दक्षिणायन के प्रतीकात्मक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा गया है—

“अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्।”
(भगवद्गीता, अध्याय 8, श्लोक 24)

यह श्लोक उत्तरायण को प्रकाश, ज्ञान और उर्ध्वगामी चेतना से जोड़ता है। युवाओं के लिए इसका अर्थ है—दिशा, धैर्य और उद्देश्य के साथ आगे बढ़ना।मकर संक्रांति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह पर्व शोर नहीं करता। यह न उन्माद का प्रतीक है, न अतिशयोक्ति का। यह पर्व शांत स्वर में यह कहता है कि वास्तविक परिवर्तन भीतर से शुरू होता है। यह परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन का आग्रह करता है, टकराव का नहीं।

अंततः मकर संक्रांति हमें यह अवसर देती है कि हम व्यक्तिगत जीवन से लेकर राष्ट्रीय नीति तक आत्ममंथन करें। क्या हमारी प्रगति समावेशी है? क्या हमारी सफलता संवेदनशील है? और क्या हमारी दिशा दीर्घकालिक कल्याण की ओर है ? जब इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक होंगे, तभी कहा जा सकेगा कि उत्तरायण केवल सूर्य का नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की चेतना का भी हुआ है। यही मकर संक्रांति का शाश्वत संदेश है—स्थिर मूल्यों के साथ परिवर्तन की यात्रा।

Aaj National

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