-बीएनएसएस-2023 व अन्य अधिनियमों के प्रावधानों के परिवाद में एफआईआर दर्ज न किये जाने के दिये दिशा- निर्देश
-न्यायालय नें बीएनएस की धारा 82 में प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत किये जाने पर आपत्ति करते हुये की गंभीर टिप्पणी
- REPORT BY:AAJ NATIONAL NEWS || EDITED BY:AAJ NATIONAL NEWS DESK
लखनऊ।उच्च न्यायालय इलाहाबाद खण्डपीठ लखनऊ के आदेश बाद प्रदेश के डीजीपी नें बीएनएसएस-2023 व अन्य अधिनियमों के प्रावधानों के अन्तर्गत परिवाद के प्रकरणों में एफआईआर दर्ज न किये जाने के दिशा- निर्देश दिये है।
डीजीपी राजीव कृष्णा नें प्रदेश के सभी पुलिस आयुक्त औऱ सभी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक औऱ पुलिस अधीक्षक को पत्र भेजकर कहा है कि न्यायालय द्वारा बीएनएस की धारा 82 में प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत किये जाने पर आपत्ति करते हुये टिप्पणी की है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 219 में यह प्रावधान है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 1 से 84 के अंतर्गत दंडनीय किसी भी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लिया जाएगा जब तक कि उस अपराध से पीड़ित किसी व्यक्ति द्वारा शिकायत न की गई हो।
हालांकि, वर्तमान मामले में, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 82 का प्रयोग अपराध संख्या 0014/2025 में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115(2), 352, 351(3), 85 और 82(1) तथा दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज करते समय किया गया है। यह मामला महिला थाना, जिला श्नवस्ती में दर्ज किया गया है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 220, 221 और 222 में यह प्रावधान है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 में कुछ अन्य अपराधों का भी उल्लेख है, जिनके लिए न्यायालय पीड़ित व्यक्ति, राज्य या लोक सेवक द्वारा दायर शिकायत के अलावा संज्ञान नहीं ले सकता। अतः, यह स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है कि न्यायालय भारतीय न्याय संहिता, 2023 में उल्लिखित अपराधों का संज्ञान नहीं लेगा।
उच्च न्यायालय द्वारा मुख्य रूप से यह मत व्यक्त किया गया है कि भारतीय न्याय संहिता, 2023 के कतिपय श्रेणी के अपराधों का संज्ञान पीड़ित पक्षकार द्वारा प्रस्तुत परिवाद के आधार पर ही लिया जा सकता है। न्यायालय ने इस संदर्भ में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 219, 220, 221 तथा 222 को संदर्भित किया है, जिसके अनुसार विवाह सम्बन्धी अपराधों (धारा-81 से 84 बीएनएस) तथा मानहानि (डिफेमेशन) (धारा-356 बीएनएस) के अपराधों में परिवाद के आधार पर ही संज्ञान लेने की व्यवस्था है।
समान प्रकृति के एक प्रकरण में, उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा सुधीर कुमार गोयल बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य में पारित आदेश के अनुपालन में पुलिस महानिदेशक, अभियोजन, उ०प्र० द्वारा प्रदेश में लागू विशेष अधिनियमों की दो अलग- अलग सूचियाँ तैयार की गयी , प्रथम सूची में वर्णित 31 विशेष अधिनियमों में न्यायालय में परिवाद दाखिल करने की प्रक्रिया निर्धारित है जबकि द्वितीय सूची में वर्णित 39 अधिनियमों में प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत किये जाने की प्रक्रिया निर्धारित है। पुलिस महानिदेशक, अभियोजन, उ0प्र0 ने अपने पत्र में दोनों सूचियों को सर्वसम्बन्धित को सूचनार्थ एवं अनुपालन हेतु प्रेषित किया गया था।
ऐसे अपराध जिनमें पीड़ित पक्षकार सक्षम प्राधिकारी द्वारा न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किये जाने पर ही संज्ञान लिये जाने की व्यवस्था भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 अथवा अन्य अधिनियमों में प्रावधानित है, उन अपराधों में प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत किया जाना विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है।
ऐसे अपराध जिनमें पीड़ित पक्षकार सक्षम प्राधिकारी द्वारा न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत किये जाने पर ही संज्ञान लिये जाने की व्यवस्था भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 अथवा अन्य अधिनियमों में प्रावधानित है, उन अपराधों में प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत किया जाना विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है। ऐसे प्रकरणों में आरोपपत्र प्रस्तुत किये जाने पर न्यायालय द्वारा संज्ञान नहीं लिया जा सकता है। इस प्रक्रियात्मक त्रुटि का लाभ अन्ततः अभियुक्त को ही मिलेगा और पीड़ित का हित विपरीत रूप से प्रभावित होगा।
उच्च न्यायालय द्वारा पारित संदर्भित आदेश के अनुपालन में डीजीपी राजीव कृष्ण नें सभी को निर्देशित किया है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत करने से पूर्व यह सुनिश्चित कर लिया जाए कि संबंधित अपराध हेतु बीएनएसएस अथवा किसी विशेष अधिनियम में प्रथम सूचना रिपोर्ट पर संज्ञान लेने की व्यवस्था है अथवा पीड़ित पक्षकार द्वारा प्रस्तुत परिवाद पर संज्ञान लिया जा सकता है। ऐसे अपराध जिनमें पीड़ित पक्षकार सक्षम प्राधिकारी द्वारा प्रस्तुत परिवाद के आधार पर ही संज्ञान लेने की व्यवस्था हो प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत नहीं की जायेगी। यदि पीड़ित व्यक्ति द्वारा ऐसे अपराध में, प्रथम सूचना रिपोर्ट पंजीकृत करने हेतु प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत परिवाद के आधार पर ही संज्ञान लेने की व्यवस्था है तो पीड़ित पक्षकार/ सक्षम प्राधिकारी को न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करने के उसके विधिक अधिकार के बारे में बता दिया जाए।
डीजीपी नें कहा है कि उच्च न्यायालय के निर्देश से अपने अधीनस्थों को अवगत कराते हुये इसका अक्षरशः अनुपालन सुनिश्चित करायें। यदि किसी अधिकारी/कर्मचारी द्वारा इन निर्देशों के अनुपालन में शिथिलता बरती जाती है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्रवाई की जाये। डीजीपी नें इस आदेश की कॉपी अपर पुलिस महानिदेशक, रेलवे, उत्तर प्रदेश व अपर पुलिस महानिदेशक, अपराध, उत्तर प्रदेश व सभी जोनल अपर पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश व उत्तर प्रदेश के सभी क्षेत्रीय पुलिस महानिरीक्षक/ उप पुलिस महानिरीक्षक को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्रवाई के लिये भेजी है।
