इन डिग्रीधारियों से तो वो अनपढ़ ही काबिल थे !

-सूर, तुलसी, कबीर ने डिग्री ली होती तो लोग उन पर पीएचडी न कर रहे होते
-किताबी ज्ञान तक सीमित होने से खत्म हो चली तर्क क्षमता

-संजय त्रिपाठी

टीवी चैनलों पर डिबेट, विभिन्न अखबारों की खबरें और सम्पादकीय पढ़ कर लगा कि किसी ने सच लिखा था “डिग्रियां तो तालीम के खर्चों की रसीदें हैं, इल्म वही है जो किरदार में झलकता है”। स्कूल-कॉलेज में दी जा रही शिक्षा की हकीकत तथाकथित बुद्धिजीवियों के व्यवहार और व्यक्तित्व में झलकती देख मैं ये दावे के साथ कह सकता हूं कि सूर, तुलसी, कबीर के पास किसी भी विश्वविद्यालय की डिग्री होती तो आज लोग उन पर पीएचडी नहीं कर रहे होते।

आज ज्ञान और किताबी ज्ञान का फर्क साफ़ झलक रहा है। हम भारतियों को किताबी ज्ञान में फंसा कर सुनियोजित तरीके से हमारी तर्क क्षमता को लगभग खत्म कर दिया गया है। सवाल और तर्क खत्म होने से हम किसी शोध अथवा रचना के लायक नहीं बचे हैं। हमारी सोच सिर्फ धर्म और जाति तक सीमित हो चली है। कहने को तो देश की जनसंख्या 140 करोड़ पार है किन्तु उनमें भारतीय कितने हैं ये शोध का विषय है। हमारा राष्ट्र प्रेम कहीं सिर्फ दिखावा तो नहीं। सच्चे देशभक्त को अपने राष्ट्र की जनता और संपत्तियों के लगाव होता है। वह किसी बहकावे में आकर अपने ही राष्ट्र के किसी व्यक्ति पर कहर नहीं बरपा सकता। देशभक्त अपने राष्ट्र की सम्पत्ति की भी रक्षा करता है न कि किसी आंदोलन व प्रदर्शन में आगजनी और तोड़फोड़ शुरू कर देता है। हम बस-ट्रेन या अन्य वाहनों को आग के हवाले करने से पहले ये नहीं सोचते कि किसका नुकसान करने जा रहे हैं।

दरअसल, हमारी तर्क क्षमता समाप्त हो चली है, अच्छा-बुरा समझने के लायक हमारा दिमाग नहीं रहा। हम चंद शातिर दिमाग लोगों की कठपुतली बन कर रह गए हैं।समाज में धर्म और जाति का जहर घोलकर हमें इतना बरगलाया जा रहा है कि हम अतीत के सच को भी जुबाँ पर नहीं ला पाते। मुगल शासनकाल में अत्याचार के अनेक किस्से पढ़ाकर हिन्दुओं में नफरत पैदा की गई जो दिनोदिन बढ़ती ही जा रही। सवाल ये भी है कि अत्याचार के उस दौर में गोस्वामी तुलसीदास को रामचरित मानस लिखने और प्रकाशन की अनुमति कैसे मिली? संत कबीर ने मुखर होकर दोनों धर्मों की आलोचना कैसे कर डाली? आज के दौर में तुलसी-कबीर न सिर्फ जेल में होते बल्कि इतनी धाराएं लगी होतीं कि जमानत कराने में लोहे के चने चबाने पड़ते। मुगल अत्याचार के बाद हमने अंग्रेजी शासनकाल की यातनाएं झेली। स्वाधीनता आंदोलन में हिंदू-मुस्लिम दोनों ही मैदान में उतरे।

सवाल ये भी है कि 300 साल मुगल शासनकाल में अत्याचार और धर्म परिवर्तन के बाद भी 15 अगस्त 1947 को भारत में लगभग 30 करोड़ हिंदू और 4.25 करोड़ मुसलमान थे। ऐसे में जबरन धर्म परिवर्तन की बात गले नहीं उतरती। अत्याचार और धर्म परिवर्तन से इन्कार नहीं किया जा सकता, लेकिन जबरन धर्म परिवर्तन की बात तर्कसंगत नहीं है। मेरा मानना है कि उच्चपद पर आसीन लोगों ने लालच और दबे-कुचले लोगों ने भय के कारण न सिर्फ धर्म परिवर्तन किया बल्कि अपनी बहन-बेटी की शादी करने में गुरेज नहीं की। उसी प्रकार मुग़लों ने अंग्रेजों के सामने घुटने टेके।
सवाल ये है कि भारतियों ने गुलामी के दौरान जो ग्रंथ लिखे, वैसे आजाद हिंदुस्तान में क्यों नहीं लिख पा रहे। सूर, तुलसी, कबीर, रहीम, रसखान जैसी विभूतियां अब जन्म नहीं ले रहीं? ऐसा नहीं है.. दरअसल अब किसी को मौका नहीं दिया जा रहा। किताबी शिक्षा हावी हो चली है। बच्चे का स्कूल दाखिला कराने से पहले ही माता-पिता उसमें डॉक्टर-इंजीनियर या सरकारी कर्मचारी अथवा सफल व्यापारी देखने लगते हैं और जो परिवार अपने बच्चे की अच्छी तालीम के काबिल नहीं समझते वो उसे कमाऊपूत बनाने के चक्कर में छोटी मोटी दुकान में काम पर लगा देते हैं। खास बात ये है कि बच्चे में धार्मिकभावना उस समय से ही ठूंसनी शुरू कर दी जाती है जब उसके दांत तक नहीं निकले होते।
धार्मिक संस्कार देने से किसी को गुरेज नहीं है किंतु मानवता एवं राष्ट्रहित का ज्ञान भी आवश्यक है। देश में सड़क हादसे और उनमें मृत्यु की संख्या इस बात का प्रमाण है कि आज़ादी के 77 साल बाद भी हम सड़क पर चलने का सलीक़ा नहीं सीख सके.. क्या ये सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी।हमारे पाठ्यक्रम में जीवन में उपयोगी बातों का अभाव दिखता है। हम लगातर पास होते रहने पर जब स्नातक करते हैं तो हमारी आयु कम से कम 20 वर्ष होती है। इस दौरान माता पिता हम पर लाखों रुपये खर्च कर चुके होते हैं और रोजगार की मंडी में हमारी औकात 5 से 25 हजार रुपये महीने की पगार से अधिक नहीं होती। स्कूल में किताबी पढ़ाई के साथ तकनीकी शिक्षा दी गई होती तो 20 साल का युवक न सिर्फ अपने लिए बल्कि देश के विकास में योगदान के काबिल होता।
सच तो ये है कि सत्ता किसी भी दल की हो या रही हो जनता को जागरूक नहीं होने देना चाहती। जनता को धर्म और जाति में उलझाए रखने में ही नेताओं का लाभ है।
नेताओं को ये भी याद रखना होगा कि राम-कृष्ण की इस धरती पर बुद्ध, विवेकानंद, महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां जैसे अनेक महापुरुषों ने जन्म लिया है जिनके पीछे जनसैलाब था। सत्ता परिवर्तन ही नहीं समाज को जागरूक किया। अभी वक्त किसी क्रांति के बिना देश को सँवारा और मजबूत किया जा सकता है। 140 करोड़ लोग किसी चमत्कार नहीं ऐसी शख्सियत के इंतजार में हैं जो धर्म-जाति से ऊपर उठकर मानवता और राष्ट्र के विकास के प्रति समर्पित नजर आए।

Aaj National

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *