-नवम्बर में प्रदेश व्यापी अनिश्चितकालीन कार्य बन्दी का ऐलान
- REPORT BY:AAJ NATIONAL NEWS || EDITED BY:AAJ NATIONAL NEWS DESK
लखनऊ। महासंघ के प्रदेश की सभी नगर निगमो,नगर निकायो व उसके सभी सहयोगी संगठनो द्वारा प्रदेश सरकार,शासन स्तर पर महासंघ की पूर्व प्रेषित लम्बित मांगो का समाधान न किये जाने के विरोध स्वरूप नगर निगम लखनऊ पर बडी सभा करके लखनऊ जीपीओ पार्क गांधी प्रतिमा पर हजारो साथियो के साथ पहुंच कर धरना प्रदर्शन कर ज्ञापन जिला प्रशासन के माध्यम से मुख्य मंत्री व नगर विकास मंत्री को दिया गया।
इस धरना-प्रदर्शन मे महासंघ की प्रदेश की सभी ईकाइयां गाजियाबाद, कानपुर, मेरठ, मुरादाबाद, झांसी,आगरा,फिरोजाबाद, गोरखपुर, बरेली,शाहजहांपुर, वाराणसी,सहारनपुर, अलीगढ, प्रयागराज,अयोध्या,लखनऊ,मथुरा-वृंदावन सहित सैकडो नगर पालिका,नगर पंचायत आदि के सफाई सहित सभी सम्वर्ग के संगठन नगर निगम जलकल कर्मचारी संघ, उ0प्र0 नगर निगम चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संघ, नगर निगम आरआर कर्मचारी संघ, जलकल नगर निगम नियमित एवं आउटसोर्सिंग कर्मचारी संघ के साथ साथ उप्र नगर निगम कर्मचारी संघ,जलकल नगर निगम चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संघ,नगर निगम नियमित एवं संविदा सफाई कर्मचारी संघ आदि के भी सैकडो प्रतिनिधि उपस्थित रहें। सभा को सभी कर्मचारी संगठनों ने सम्बोधित करते हुए कहा कि आज प्रदेश सरकार व नगर विकास विभाग द्वारा प्रदेश के निकाय कर्मचारियों की सेवा सम्बन्धी व अन्य 10 सूत्रीय मांगो का बहुत लम्बें समय से कोई समाधान नही कर रही है जिससे प्रदेश के निकाय कर्मचारियों मे भारी आक्रोश व्याप्त होना सम्भाविक है। ?
सभा मे महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष शशि कुमार मिश्र,महामंत्री रमाकांत मिश्र कानपुर व गाजियाबाद से कार्य वाहक प्रदेशअध्यक्ष राकेश अग्निहोत्री सहित आगरा से विनोद इलाहाबादी, गोरखपुर से आर पी सिंह, फिरोजाबाद से छकोडी लाल,मेरठ से मो.अनीस,अलीगढ से संजय सक्सेना, मुरादाबाद से मो.सुभहान ,बरेली से ठाकुर मिशनपाल सिंह,वाराणसी से अखिलेश सिंह, शाहजहांपुर से धमेन्द्र कश्यप,सहारनपुर से रामकुमार, झांसी से मो.परवेज खान, प्रयागराज से मनोज श्रीवास्तव, अयोध्या से विनय बाघमार,मथुरा-वृंदावन से उत्तम चन्द्र, प्रदेश सरकार व शासन से मांग की है कि यदि 9 नवम्बर 25 तक पूर्व में शासन स्तर पर हुई बैठको व अकेन्द्रियत सेवा नियमावली, वर्ष 2001 तक कार्यरत दैनिक वेतन,संविदा,तदर्थ कर्मचारियो का विनियमतीकरण आदि मांगो के आदेश नही जारी होते तो महासंघ 10 नवम्बर से प्रदेश व्यापी अनिश्चितकालीन कार्य बन्दी करेगा।इस बीच पूरे माह काली पट्टी बांध कर तथा राजधानी लखनऊ सहित सभी ईकाईयो पर क्रमिक अनशन,धरना-प्रदर्श,गेट मीटिंग आदि प्रदेश की ईकाइयो के साथ करता रहेगा,जब तक सम्बंधित आदेश निर्गत नही हो जाते। आज के इस आन्दोलन को कर्मचारी शिक्षक संयुक्त मोर्चा उ.प्र.के अध्यक्ष वीपीमिश्र सहित सभी घटक संगठनो का भी समर्थन मिला जिसमें जवाहर भवन इन्दिराभवन कर्मचारी महासंघ व उ.प्र.राज्य कर्मचारी महासंघ के अध्यक्ष सतीश पाण्डेय ,रोडवेज से महामंत्री गिरीश मिश्र, उ.प्र.राज्य निगम कर्मचारी महासंघ के महामंत्री घनश्याम यादव,राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद महामंत्री से अतुल मिश्र, आदि ने भी सभा को सम्बोधित कर पूरा सहयोग अगामी आन्दोलन में देने का समर्थन किया।
उड़ीसा लाइसेंस निरस्त को संज्ञान लेकर आयोग करेगा सुनवाई
-बिजली के निजीकरण का निर्णय रद्द करने की मांग
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि उड़ीसा में हुए बिजली वितरण के निजीकरण के प्रयोग के विनाशकारी परिणाम आने के बाद उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम के निजीकरण का निर्णय निरस्त किया जाय। संघर्ष समिति के आह्वान पर आज लगातार 316वें दिन निजीकरण के विरोध में बिजली कर्मियों ने प्रदेश के समस्त जनपदों में व्यापक विरोध प्रदर्शन जारी रखा। विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उप्र के केंद्रीय पदाधिकारियों ने आज यहां बताया कि उड़ीसा के विद्युत नियामक आयोग ने स्वतः संज्ञान लेते हुए टाटा पावर की चारों विद्युत वितरण कंपनियों का लाइसेंस निरस्त करने के लिए 10 अक्टूबर को सुनवाई की तारीख तय की है। नियामक आयोग ने टाटा पावर की चारों कंपनियों को जुलाई माह में उपभोक्ता सेवा में विफल रहने पर नोटिस जारी किया था। टाटा पावर का कोई संतोषजनक उत्तर न मिलने के बाद विद्युत नियामक आयोग जनसुनवाई कर रहा है।
संघर्ष समिति ने बताया कि उड़ीसा के सभी उपभोक्ता फोरमों की ओर से श्री किशोर पटनायक ने 16 अगस्त को टाटा पावर की चारों विद्युत वितरण कंपनियों के विरुद्ध उपभोक्ता सेवा में पूरी तरह अक्षम रहने और उपभोक्ताओं का उत्पीड़न करने के आरोप लगाते हुए इन कंपनियों का विद्युत वितरण का लाइसेंस निरस्त करने की मांग की थी।उपभोक्ता फोरमों ने उड़ीसा विद्युत नियामक आयोग रेगुलेशन 2004 की धारा 9(1) और (4) के अंतर्गत उपभोक्ता सेवाओं में पूरी तरह विफल रहने के आरोप लगाते हुए याचिका दाखिल की थी।उपभोक्ता फोरमों ने अपनी प्रेयर में कहा है कि विद्युत परिषद को विघटित करने का और उसके उपरांत विद्युत वितरण का निजीकरण करने का सबसे पहला प्रयोग उड़ीसा में हुआ। यह दोनों ही प्रयोग पूरी तरह विफल रहे हैं। निजीकरण के परिणाम विनाशकारी हैं और उपभोक्ता दर दर भटक रहे हैं।उपभोक्ता फोरमों का आरोप है कि भीषण गर्मी में घंटों बिजली की कटौती की जा रही है, बिना प्रॉपर नोटिस के विद्युत विच्छेदन किया जा रहा है, बेतहाशा बढ़े हुए गलत बिल भेजे जा रहे हैं और सबसे अधिक स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाकर उपभोक्ताओं को परेशान किया जा रहा है।उपभोक्ता फोरमों ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि उड़ीसा के पूर्व बिजली कर्मियों को टाटा पावर तृतीय श्रेणी का नागरिक मानती है। उनको बिना काम के किनारे बैठा रखा गया है और उनका करियर बर्बाद हो रहा है। संघर्ष समिति ने कहा की उड़ीसा में सबसे पहले 1999 में निजीकरण किया गया था। निजीकरण के एक साल बाद ही अमेरिका की एईएस कंपनी वापस चली गई। रिलायंस पावर की बाकी तीनों कंपनी का लाइसेंस फरवरी 2015 में विद्युत नियामक आयोग ने पूरीप तरह अक्षम रहने के कारण रद्द कर दिया था। 2020 में चारों कंपनियों का लाइसेंस टाटा पावर को दिया गया और अब विद्युत नियामक आयोग ने बेहद खराब उपभोक्ता सेवा का स्वतरू संज्ञान लेते हुए 15 जुलाई 2025 को टाटा पावर की चारों कंपनियों को नोटिस जारी कर दिया है। टाटा पावर का लाइसेंस निरस्त करनी हेतू अब 10 अक्टूबर को सुनवाई हो रही है।
निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण को हटाने की मांग
चतुर्थ वेतनमान पा रहे अल्प संख्यक वित्तीय विकास निगम के कर्मचारियों के वेतन कटौती के प्रकरण में शासन से परामर्श मांगने के बावजूद बिना शासन का उत्तर आए निदेशक अल्प संख्यक कल्याण अंकित अग्रवाल द्वारा कर्मचारियों के वेतन कटौती का आदेश किए जाने से दोनों भवनों के कर्मचारियों में व्यापक आक्रोश व्याप्त हो गया है।इस संबंध में महासंघ के अध्यक्ष सतीश कुमार पाण्डेय की अध्यक्षता में हुई बैठक में निदेशक अल्प संख्यक कल्याण को पद से हटाने की मांग की गई। यह जानकारी देते हुए महासंघ के अध्यक्ष सतीश कुमार पाण्डेय ने बताया किवर्ष 2017 में चतुर्थ वेतन मान पा रहे कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए तत्कालीन प्रबंध निदेशक द्वारा इन कर्मचारियों को अंतरिम राहत प्रदान करते हुए छठे एवं सातवें वेतन मान में हुए अंतर का आंकलन करते हुए अंतरिम राहत प्रदान की गई थी। तब से निरंतर कर्मचारियों को इसके अनुरूप वेतन मिल रहा था।इस अवधि में कई प्रबंध निदेशकों द्वारा कार्य किया गया और किसी ने भी दी गई अंतरिम राहत को नियम विरुद्ध नहीं माना गया। वर्तमान निदेशक द्वारा भी मार्च 2025 से अभी तक उसी वेतन के अनुरुप ही कर्मचारियों को वेतन दिया गया। अब अचानक से दी गई अंतरिम राहत को नियम विरुद्ध बताते हुए वेतन कटौती काआदेश किया गया है। इस मामले में महासंघ का प्रतिनिधि मण्डल निदेशक से मिला था और उन्होंने आश्वासन दिया था। लेकिन बाद में कटौती कर दी जिससे नाराज महासंघ ने प्रदर्शन कर उन्हें हटाने की मांग की हैै।
निदेशक द्वारा दिए गए इस आदेश से न केवल निगम कर्मचारी बल्कि दोनों भवनों के हज़ारों कर्मचारियों में आक्रोश फैल गया। इस गंभीर प्रकरण पर महासंघ के अध्यक्ष सतीश कुमार पाण्डेय ने तत्काल एक आपातकालीन बैठक आहूत करके इस प्रकार की हठधर्मिता करने वाले निदेशक को पद हटाए जाने की मांग की गई है। श्री पाण्डेय ने यह भी बताया कि इस विषय पर निदेशक से मिलकर शासन के निर्णय आने तक वेतन कटौती काआदेश न किया जानें का अनुरोध भी किया गया था जिस पर निदेशक द्वारा सकारात्मक आश्वासन भी दिया गया था किंतु निदेशक द्वारा शासन के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही वेतन कटौती के आदेश पारित किए जाने से यह सिद्ध होता है कि निदेशक स्वयं को शासन से भी ऊपर समझ रहे हैं। श्री पाण्डेय ने कहा है कि निदेशक अल्प संख्यक कल्याण को हटाने के लिए आज ही मुख्यमंत्री को पत्र प्रेषित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर निदेशक को शीघ्र ही इस विभाग से नहीं हटाया गया तो दोनों भवनों के हज़ारों कर्मचारियों द्वारा सीधे संघर्ष की घोषणा कर दी जाएगी।
आज की बैठक में उपाध्यक्ष उमंग निगम,संजय कुमार शुक्ला,विजय कुमार अवस्थी,अमित शुक्ला,अमित खरे, श्रीमती दिव्या श्रीवास्तव,एवं अन्य पदाधिकारी शफीकुर्रहमान अंसारी, डी के मिश्रा, दिनेश कुमार सिंह,रितिका शर्मा, नियाजउद्दीन,रिजवान अहमद एवं राम बदल दुबे एवं रघुराज सिंह उपस्थित थे।
घाटे के लिए केंद्र व राज्य सरकार की कुछ नीतियां जिम्मेदार
निजीकरण से जनता का नुकसान और उद्योगपतियों का फायदा: अवधेश
राज्य की उपभोक्ता परिषद द्वारा आज मीडिया को जारी एक महत्वपूर्ण बयान में वर्ष 2000 से लेकर वर्तमान तक बिजली कंपनियों के घाटे में भारी वृद्धि और इसके पीछे केंद्र व राज्य सरकारों की नीतिगत विफलताओं को जिम्मेदार ठहराया गया है। परिषद ने यह स्पष्ट किया कि वर्ष 2000-01 में जहाँ घाटा मात्र 77 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह बढ़कर 1 लाख 10 हजार करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है।उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष व राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने कहा वर्ष 2000 में राज्य विद्युत परिषद का विघटन कर उसे कई कंपनियों में विभाजित किया गया था और दावा किया गया था कि इससे बिजली क्षेत्र में व्यापक सुधार होगा। लेकिन बीते 24 वर्षों के आँकड़े यह साबित करते हैं कि सुधार के स्थान पर घाटा दिनों-दिन बढ़ता गया।
परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि हाल ही में बिजली कंपनियों के घाटे को अचानक उजागर करना कहीं न कहीं बड़े निजी घरानों को लाभ पहुँचाने की दिशा में एक कदम है। यह प्रक्रिया उपभोक्ताओं और जनहित के खिलाफ है।उपभोक्ता परिषद की मांगें कि है कि विद्युत नियामक आयोग किसी भी प्रकार की आरएफपी और निजीकरण के प्रस्ताव पर निर्णय लेने के पहले अथवा नीति निर्धारण से पहले जन सुनवाई अवश्य आयोजित करे।निजीकरण के हर प्रयास का विरोध किया जाएगा, क्योंकि इससे उपभोक्ताओं पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा और पारदर्शिता समाप्त होगी।पावर कारपोरेशन द्वारा 2 अप्रैल 2013 के विद्युत नियामक आयोग के आदेश का उल्लंघन कर निजीकरण को आगे बढ़ाने की बात करना अवैध है। उपभोक्ता परिषद की आज का पर विद्युत नियामक आयोग ने वर्ष 2013 में या आदेश दिया था कि किसी भी निजीकरण के मामले में पहले उसे उपभोक्ताओं का क्या लाभ होगा या नियामक आयोग को बताया जाए लेकिन ऐसा नहीं किया गया अतः विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 142 के अंतर्गत कार्रवाई शुरू की जाए।परिषद ने आगे कहा कि घाटे के लिए केवल बिजली कंपनियाँ नहीं, बल्कि विभिन्न असफल सरकारी योजनाएँ जैसे उदय, पावर फॉर ऑल, एफआरपी सौभाग्य योजना और महंगी बिजली खरीद भी जिम्मेदार हैं।जनहित में उपभोक्ता परिषद आयोग से आग्रह करती है कि उपरोक्त तथ्यों के आधार पर निर्णय लें और उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा सुनिश्चित करें।
