- REPORT BY:AAJ NATIONAL NEWS || EDITED BY:AAJ NATIONAL NEWS DESK
लखनऊ :यूपी में घोटालों का सिलसिला प्रारम्भ हो गया है,प्रदेश के शाहजहांपुर में आशा कार्यकर्ताओं के भुगतान में घोटाला हुआ तो वही आगरा में बड़ा जीएसटी घोटाला सामने आया है।हलांकि यह घोटाले सामने आने के बाद बड़े अफसरों की नींद उड़ गयी है।इन घोटालों को लेकर बड़ी कार्रवाई भी हुई है।दोनों घोटाले अब बड़ा सवाल खड़ा कर रहे है ।
शाहजहांपुर में हुआ आशा कार्यकर्ताओं के भुगतान में घोटाला
-वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री का कड़ा एक्शन, हिरासत में पांच कर्मचारी हिरासत में
शाहजहांपुर में आशा कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहन राशि के रूप में मिलने वाले लाखों रुपयों के घपले का आरोप लगा है। 300 आशा कार्यकर्ताओं का आठ महीने का रुका मानदेय देने के बजाय नोडल अधिकारी ने कह दिया कि उनके हिस्से का बजट दूसरे मद में खर्च हो चुका है। सुरेश खन्ना ने प्रकरण की जांच बैठाने के बाद रविवार शाम क्राइम ब्रांच सक्रिय हुई। टीम ने सीएमओ कार्यालय में मीटिंग करने आए भुगतान कार्य से जुड़े पांच कर्मचारियों को उठा लिया। उनसे पूछताछ की जा रही है।आशाओं का आरोप है कि आठ महीने में प्रत्येक आशा के औसतन 40-40 हजार रुपये का गबन किया गया है। जिले में 2700 आशा कार्यकर्ता हैं। उन्हें प्रतिमाह 1500 रुपये मानदेय एवं कुष्ठ निवारण अभियान समेत कई अन्य सर्वे में औसतन 3500 रुपये मिलते हैं। भावलखेड़ा ब्लाक की 300 आशाओं भुगतान नहीं मिलने से कई दिनों से आंदोलित हैं।पिछले सप्ताह आशा कार्यकर्ता के संगठन की जिलाध्यक्ष जिलाध्यक्ष कमलजीत कौर ने वित्त मंत्री सुरेश कुमार खन्ना से भी शिकायत की थी। उनका आरोप था कि भुगतान मांगने पर अधिकारी कह रहे कि आपके हिस्से का बजट महाकुंभ में खत्म हो चुका है। इस पर वित्त मंत्री ने अधिकारियों से नाराजगी जताते हुए सीडीओ डा. अपराजिता सिंह से जांच कराने को कहा था।एसपी राजेश द्विवेदी ने भी आशाओं की शिकायत पर क्राइम ब्रांच को जांच सौंप दी थी। रविवार को शाम को सीएमओ डा. विवेक मिश्रा ने इस प्रकरण में भुगतान कार्य संभालने वाले नोडल अधिकारी, लेखा विभाग के अधिकारी, ब्लाक प्रबंधक, हेल्थ वर्कर आदि को बैठक के लिए बुलाया था।देर शाम वहां पहुंची क्राइम ब्रांच उन पांचों लोगों को अपने साथ ले गई। पूछताछ की जा रही है।आखिर आशाओं के लिए आया बजट कहां और किसकी अनुमति से दूसरे मद में खपाया गया।
आगरा में हुआ बड़ा जीएसटी घोटाला,सात फर्जी फर्म बनाकर आईटीसी में करोड़ों का खेल,दो के खिलाफ एफआईआर
राज्य वस्तु एवं सेवा कर एसजीएसटी ने फर्जी फर्माें द्वारा किए जा रहे इनपुट टैक्स क्रेडिट यानि बआइटीसी के बड़े खेल को पकड़ा है। लंबे समय तक रेकी के बाद कागजों पर चल रही सात फर्मों के विरुद्ध आइटीसी क्लेम का मुकदमा दर्ज कराया गया है। केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर सीजीएसटी में पंजीकृत फर्में एसजीएसटी के सत्यापन में मौके पर नहीं पाई गईं। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर फर्मों ने पंजीकरण कराया था। फर्मोंं द्वारा करोड़ों रुपये का गोलमाल कर राज्य कर विभाग काे राजस्व की क्षति पहुंचाए जाने की संभावना है। पुलिस व विभाग इसकी जांच में जुटे हैं।एसजीएसटी की विशेष अनुसंधान शाखा-बी ने लखनऊ मुख्यालय के निर्देश पर सात फर्मों की रेकी की थी। इनमें चार जून, 2022 से 10 जून 2024 की अवधि में सक्रिय रहीं दिगनेर के पते पर पंजीकृत ओम ट्रेडर्स और पुनियापाड़ा के पते पर पंजीकृत श्रीराम ट्रेडर्स को अस्तित्वहीन पाया गया।ओम ट्रेडर्स के पते को इस वर्ष 24 मई को संशोधित कर 24/16 पुनिया पाड़ा किया गया था, जो श्रीराम ट्रेडर्स का भी पता था। फर्जी फर्माें ने सुनियोजित तरीके से आइटीसी का लाभ पहुंचाने को कूटरचित अभिलेखों के आधार पर पंजीयन प्राप्त कर विभाग को राजस्व की क्षति पहुंचाई।राज्य कर अधिकारी अतुल कुमार आर्य की तहरीर पर लोहामंडी थाने में दोनों फर्मों का पंजीकरण कराने वाले दीपक सोनी और संदीप के विरुद्ध धोखाधड़ी व कूटरचित दस्तावेज की धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया है। इसके साथ ही 11 नवंबर 2024 से 30 अप्रैल 2025 तक सक्रिय रहीं आरएस ट्रेडर्स, बालाजी ट्रेडर्स, आकाश ट्रेडर्स, सिंह ट्रेडर्स, पीके ट्रेडर्स की जांच की।अस्तित्वहीन फर्जी फर्मों ने सुनियोजित तरीके से दूसरी फर्मों को आइटीसी का लाभ पहुंचाने को कूटरचित प्रपत्रों के आधार पर पंजीयन प्राप्त कर राज्य कर विभाग को राजस्व की क्षति पहुंचाई। राज्य कर अधिकारी प्रशांत कुमार गौतम की तहरीर पर इन फर्मों का पंजीकरण कराने वाले क्रमश: अंकित कुमार, शिवम प्रताप, आकाश, दीपक और लवकुश के विरुद्ध धोखाधड़ी व कूटरचित दस्तावेज की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है। संयुक्त आयुक्त चंद्रकांत रलहन ने बताया कि लखनऊ मुख्यालय के निर्देशों पर सीजीएसटी में पंजीकृत सात फर्मों की जांच की गई थी। फर्जी फर्में आइटीसी पास आन करने के खेल में शामिल थीं।जीएसटी विशेषज्ञ सीए सौरभ अग्रवाल ने बताया कि एक फर्म माल की खरीद पर जो कर चुकाती है, वह फार्म का इनपुट टैक्स क्रेडिट आइटीसी होता है। मान लेते हैं कि फर्म से 100 रुपये की खरीद पर 18 रुपये का कर बना। इस माल को फर्म ने 200 रुपये में बेच दिया, जिस पर 36 रुपये कर बना।बिक्री पर बने 36 रुपये के कर में से खरीद पर बने 18 रुपये के कर को काटना ही आइटीसी समायोजन कहलाता है। 36 रुपये को पास आन आइटीसी कहते हैं। बिना वास्तविक सप्लाई के केवल फर्जी बिल जारी कर दिया जाता है।सीजीएसटी में फर्मों के पंजीकरण के बाद उनके सत्यापन पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता है। एसजीएसटी द्वारा सात फर्मों की रेकी और भौतिक सत्यापन से इस बात को बल मिला है।
