- REPORT BY:AAJ NATIONAL NEWS || EDITED BY:AAJ NATIONAL NEWS DESK
लखनऊ। बंथरा थाना क्षेत्र के अमावां गांव में 1 सितंबर 2025 को गाटा संख्या 968 पर स्थित रामदत्त पुत्र चेतराम के प्लाट की बाउंड्री वॉल को
लेकर दो पक्षों के बीच हिंसक झड़प हो गई। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ बंथरा थाने में मुकदमा दर्ज कराया है।
रामदत्त ने आरोप लगाया कि सलीम अहमद उर्फ वसीम अहमद, शमीम अहमद, शरीफ अहमद, नसीम अहमद, नदीम अहमद, सलीम की पत्नी इंन्डा और चार-पांच अज्ञात लोगों ने सुबह 8 बजे उनकी बाउंड्री तोड़ दी। विरोध करने पर गाली-गलौज, मारपीट और जान से मारने की धमकी दी गई। सलीम की पत्नी ने रामदत्त के दाहिने पैर पर डंडे से हमला किया, जिससे उन्हें चोटें आईं। रामदत्त ने बताया कि पुलिस के मौके से जाने के बाद आरोपियों ने दोबारा बाउंड्री तोड़ी और धमकी दी। उन्होंने 31 अगस्त को भी इस संबंध में शिकायत दर्ज की थी और अब FIR की मांग कर रहे हैं।
वहीं तहरुन्निशा, पत्नी वसीम, ने अपनी शिकायत में कहा कि रामदत्त उनकी जमीन पर बाउंड्रीवॉल बनवा रहे थे। विरोध करने पर रामदत्त ने गाली-गलौज और मारपीट की, जिससे उन्हें अंदरूनी चोटें आईं। तहरुन्निशा ने भी थाने में शिकायत दर्ज कर कार्रवाई की मांग की है।पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच कर रही है और दोनों पक्षों के दावों की पड़ताल की जा रही है।
बंथरा में 16 वर्षीय छात्र की रहस्यमयी गुमशुदगी
बंथरा थाना क्षेत्र में एक 16 वर्षीय छात्र मानवेन्द्र यादव के लापता होने का मामला सामने आया है। ग्राम गुलाबखेड़ा, मजरा कुरौनी निवासी शिव
भजन यादव ने थाना बंथरा में अपने पुत्र की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई है। उनके अनुसार, मानवेन्द्र, जो कमल दिल्ली पब्लिक स्कूल, बंथरा में इंटरमीडिएट का छात्र है, 1 सितंबर 2025 को सुबह करीब 8 बजे स्कूल के लिए घर से निकला था। स्कूल की वर्दी (सफेद शर्ट, हल्की नीली पैंट, स्कूल का मोनोग्राम, काली फाइबर सैंडल) और स्कूल बैग के साथ निकले मानवेन्द्र दोपहर 2:30 बजे तक घर नहीं लौटा।शिव भजन ने बताया कि उन्होंने अपने बेटे के मोबाइल नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन फोन रिसीव होने के बावजूद कोई बातचीत नहीं हुई। स्कूल प्रशासन ने सूचित किया कि मानवेन्द्र उस दिन स्कूल नहीं पहुंचा। परिजनों ने उसकी तलाश की, लेकिन अभी तक कोई सुराग नहीं मिला।मानवेन्द्र का हुलिया:रंग: गेहुआ लंबाई: करीब 5.5 फीट,शारीरिक बनावट: लंबा चेहरा, इकहरा बदन, हल्की मूंछ और दाढ़ी पहनावा: स्कूल यूनिफॉर्म (सफेद शर्ट, हल्की नीली पैंट, स्कूल मोनोग्राम, काली फाइबर सैंडल), स्कूल बैग शिव भजन ने पुलिस से अपने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगाई है। पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है
दहेज उत्पीड़न मारपीट के मामले कीरिपोर्ट दर्ज
बिजनौर थाना क्षेत्र में एक महिला ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ दहेज उत्पीड़न, मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का
आरोप लगाते हुए तहरीर दी है। पीड़िता सपना, पुत्री मिश्री लाल, निवासी ग्राम परवर पूरब, ने बताया कि उनकी शादी 30 मार्च 2022 को अमित कुमार, निवासी गोसाईगंज, लखनऊ, से हुई थी। शादी में उनके परिवार ने करीब चार लाख रुपये खर्च किए थे।सपना ने आरोप लगाया कि शादी के कुछ समय बाद ही उनकी सास माया देवी और देवर आशीष ने कम दहेज लाने और नकदी व अपाची गाड़ी की मांग को लेकर ताने देने शुरू कर दिए। उनके पति अमित भी शराब पीकर गाली-गलौज और मारपीट करते थे। 10 मई 2023 को अमित ने सपना और उनके पुत्र को घर से निकाल दिया, जिसके बाद से वह अपने मायके में रह रही हैं।सपना ने बताया कि 26 जनवरी 2025 को शाम करीब 5 बजे अमित 3-4 अज्ञात लोगों के साथ उनके मायके पहुंचा और गाली-गलौज व मारपीट शुरू कर दी। उसने सपना को 4-5 थप्पड़ मारे और जान से मारने की धमकी दी। पड़ोसियों के आने पर अमित और उसके साथी भाग गए। इस घटना से सपना डरी-सहमी हैं।सपना ने बिजनौर थाने में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने और कानूनी कार्रवाई की मांग की है। पुलिस ने तहरीर मिलन पर मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी है।
एक दशक बाद सई नदी का भरा बारिश के पानी से पेट,खरीफ फसलों को नुकसान, धान को लाभ, 43 साल बाद भी नहीं बने सन् 1982 जैसे बाढ़ के हालात
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की आखिरी सीमा पर बसी ग्राम सभा बनी से होकर गुजरने वाली पौराणिक सई नदी एक बार फिर उफान
पर है। हरदोई से निकलकर लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, और प्रतापगढ़ जैसे कई जनपदों से गुजरने वाली इस नदी का जलस्तर इस बार भारी बारिश के कारण बढ़ गया है। नदी का पेट पानी से लबालब भर गया है, जिससे ग्रामीण इलाकों के खेतों में खड़ी फसलों में पानी भर गया है। खरीफ फसलों को भारी नुकसान हुआ है, लेकिन धान की फसल को इस उफान से लाभ पहुंचा है। यह स्थिति 1982 की उस भयावह बाढ़ की यादें ताजा करती है, जब सई नदी ने विकराल रूप धारण किया था।
1982 की बाढ़: एक भयावह इतिहास
सन् 1982 में सई नदी में आई बाढ़ ने लखनऊ-कानपुर हाईवे को अपने आगोश में ले लिया था। उन्नाव के सीमावर्ती ग्राम सभा बजेहरा के पास नदी का पानी इतनी तेजी से हाईवे के ऊपर से बह रहा था कि लोगों को सड़क पार करने के लिए हाथी की सवारी का सहारा लेना पड़ा था। तेज धारा में कई वाहन बह गए थे, और सैकड़ों लोग हर समय सड़क पर बहते पानी का तमाशा देखने के लिए जमा रहते थे। उस समय सई नदी ने लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, और प्रतापगढ़ के सैकड़ों गांवों में तबाही मचाई थी। बाढ़ के पानी ने कई गांवों को जलमग्न कर दिया, जिससे हजारों लोग बेघर हो गए। बाढ़ पीड़ितों के लिए राहत शिविर लगाए गए थे, जहां खाद्य सामग्री और अन्य राहत सामग्री वितरित की गई थी। दुखद रूप से, कई लोगों को नदी की तेज धारा ने निगल लिया था। सन् 1982 की बाढ़ के बाद सई नदी का ऐसा विकराल रूप दोबारा देखने को नहीं मिला। लगातार कम होती बारिश के कारण पिछले एक दशक से अधिक समय से नदी का पेट बारिश के मौसम में भी पूरी तरह नहीं भर पाया था। इस बार, भारी बारिश और ऊपरी क्षेत्रों से आए पानी ने सई नदी को फिर से जीवंत कर दिया है। नदी के बढ़े जलस्तर ने खेतों को जलमग्न कर दिया है।सई नदी के उफान ने ग्रामीण किसानों के लिए मिश्रित परिणाम लाए हैं। खेतों में खड़ी खरीफ फसलों जैसे उर्द,मक्का, मूंग, और तिल्ली को भारी नुकसान पहुंचा है। कई किसानों के खेत पूरी तरह जलमग्न हो गए हैं, जिससे उनकी मेहनत बर्बाद हो गई है। वहीं, धान की फसल को इस बाढ़ से लाभ हुआ है, क्योंकि धान को अधिक पानी की आवश्यकता होती है। स्थानीय किसान गौरी शंकर ने बताया, “धान की फसल इस बार अच्छी होगी, लेकिन अन्य फसलों का नुकसान पहुंचा है।
सई नदी का पौराणिक महत्व
सई नदी का महत्व केवल भौगोलिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और पौराणिक भी है। इसका उल्लेख तुलसीदास रचित रामचरितमानस और रामायण में भी मिलता है, जो इस नदी को आध्यात्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बनाता है। यह नदी न केवल स्थानीय लोगों के लिए जीवन रेखा है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का भी हिस्सा है।सई नदी का यह उफान प्रकृति की अपार शक्ति का प्रदर्शन तो है ही, साथ ही यह जलवायु परिवर्तन और अनियमित वर्षा के दौर में बाढ़ प्रबंधन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। प्रशासन और किसानों को मिलकर इस स्थिति से निपटने की जरूरत है, ताकि नुकसान को कम किया जा सके और भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचा जा सके। सई नदी का यह उफान न केवल स्थानीय लोगों के लिए चुनौती है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को भी सामने लाता है।
